शिव वेदी

संस्थापिका • साधिका

संघर्ष से साधना तक

परिचय

संघर्ष से साधना तक

मेरा जन्म हरियाणा के रोहतक जिले के ग्राम मकड़ौली कलां में हुआ। जन्म के समय माता ने मेरा नाम कमला रखा था। लेकिन जीवन ने मुझे बहुत कम उम्र में ही संघर्ष का पाठ पढ़ा दिया — जब मैं मात्र आठ माह की थी, तब मेरे पिता श्री चंद्रसिंह जी इस संसार से विदा हो गए।

मेरी माता श्रीमती सरजो देवी जी ने अकेले ही पाँच बच्चों को पाला। घर में आय का कोई स्थायी साधन नहीं था — एक भैंस का दूध बेचकर उन्होंने पूरे परिवार का जीवनयापन किया। उन्होंने अभाव में भी हम सभी के भीतर संस्कार, श्रम और आस्था के बीज बोए।

बचपन से ही मेरा झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था। उन दिनों मुझे खुली आँखों से रंग-बिरंगे दिव्य प्रकाश के दर्शन होते थे। परिवार इसे सामान्य या शारीरिक कमजोरी का असर समझता था — लेकिन साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के बाद मुझे समझ आया कि वे दर्शन मेरे पूर्व संस्कारों और आंतरिक चेतना की पहली आवाज़ें थीं।

संघर्ष ने मुझे तोड़ा नहीं — बल्कि उसी मिट्टी में मेरी साधना की जड़ें और गहरी हुईं।
यात्रा

साधना यात्रा के पड़ाव

बाल्यकाल

दिव्य प्रकाश के दर्शन

बचपन में खुली आँखों से रंग-बिरंगे दिव्य प्रकाश दिखते थे — यह आध्यात्मिक चेतना का पहला संकेत था।

1993

विवाह — गृहस्थ आश्रम का आरम्भ

12 दिसंबर 1993 को श्री सतवीर जी के साथ विवाह हुआ। गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों के साथ-साथ साधना भी निरंतर जारी रही।

2003

गुरु दीक्षा — जीवन का महत्वपूर्ण मोड़

कबीर जयंती के पावन अवसर पर पूज्य सतगुरु श्री शिव गंगा साहिब जी से गुरु दीक्षा प्राप्त हुई। विचार, व्यवहार, वाणी और जीवनशैली — सब बदलने लगे।

साधना काल

“वेदी” — एक दिव्य स्वप्न का वरदान

ध्यान के दौरान मैंने स्वयं को एक छोटी सी बच्ची के रूप में देखा। सतगुरु ने “वेदी” नाम से पुकारकर मुझे अपनी ओर बुलाया, एक लाल चुनरी मुझ पर उड़ा दी, और गोद में उठाकर संतों की महफिल के बीच उतार दिया। तब से मैंने स्वयं को “कमला” नहीं, “वेदी” के रूप में पहचानना शुरू किया — यही मेरी आध्यात्मिक पहचान बनी।

1996 · 2006

मातृत्व और साधना — दोनों साथ

पुत्र अंकुश (16 अक्टूबर 1996) और पुत्री आस्था (18 अक्टूबर 2006) का जन्म। माँ की ज़िम्मेदारी और परमात्मा की स्मृति — दोनों साथ-साथ चले।

वर्तमान

शिव वेदी जागृति मिशन

सत्संग, ध्यान, YouTube और डिजिटल माध्यमों से सनातन ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य जारी है।

गृहस्थ साधना

घर ही बन गया साधना स्थल

मेरा जीवन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि आध्यात्मिक साधना के लिए जंगल, पर्वत या आश्रम की आवश्यकता नहीं होती। मैंने गृहस्थ जीवन की सभी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए साधना को न केवल जीवित रखा, बल्कि उसे और अधिक गहरा किया।

प्रातः चार बजे उठना, स्नान के बाद पति के साथ पाठ और भजन करना — यह मेरी दिनचर्या का अटूट हिस्सा था। रसोई में भोजन बनाते समय भी ओंकार का जाप और परमात्मा की स्मृति बनी रहती थी। पूरा परिवार एक साथ बैठकर प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण करता था।

अनेक वर्षों तक मैंने श्रावण से कार्तिक तक के चार पवित्र महीनों में विशेष साधना का संकल्प लिया। जीभ के स्वाद पर संयम रखा — खाने का त्याग नहीं, बल्कि स्वाद के आकर्षण से ऊपर उठने का अभ्यास किया। 11 दिनों के मौन व्रत में भी परिवार की सभी ज़िम्मेदारियाँ पूरी तरह निभाईं।

परिवार, रिश्ते और जीवन की परिस्थितियाँ — ये सब हमारी सहनशक्ति, विनम्रता और प्रेम की परीक्षा लेती हैं। और यही परीक्षाएँ हमारी सबसे बड़ी साधना हैं।
पुनर्जागरण

वह रात — जब प्रकाश उतरा भीतर

मेरी साधना यात्रा में एक ऐसा दौर आया जब साधना अचानक रुक गई। कई वर्षों तक यह स्थिति बनी रही। जब भी गुरुदेव के पास जाती, तो एक ही प्रार्थना होती — “गुरुदेव, मेरी साधना फिर से कब शुरू होगी?” गुरुदेव ने सहज भाव से कहा — “गुरु सत्संग में तेरा उत्तर आ जाएगा।” और अगले ही दिन सत्संग में वह उत्तर मिला।

लगभग दो वर्ष बाद गुरुदेव हमारे घर पधारे। मैंने कहा कि मेरे पूजा स्थान में कबीर साहब, बाबा गरीबदास जी और गुरुदेव — तीनों के चित्र हैं, और ध्यान में तीनों रूप उपस्थित हो जाते हैं, इसलिए एक ही रूप को आधार बनाना चाहती हूँ। तब गुरुदेव ने ऊपर की ओर संकेत करते हुए कहा — “एक कबीरा।”

उनके जाने के बाद उसी रात — अचानक अत्यंत तीव्र प्रकाश का अनुभव हुआ। उस प्रकाश के मध्य दो दिव्य नेत्रों का दर्शन हुआ। जब भी आँखें बंद करती, एक सूक्ष्म प्रकाश बिंदु ऊपर से उतरकर भ्रूमध्य में समाता प्रतीत होता। यह क्रम पूरी रात चलता रहा। उस रात से मेरी साधना का पुनर्जागरण हुआ और श्रीमद्भगवद्गीता के गहन अध्ययन की ओर मार्ग खुला।

साधना का आधार

आत्मा के चार स्तंभ

🕊️

पवित्रता

विचारों, भावनाओं और संकल्पों की शुद्धि।

🔥

तपस्या

इंद्रियों पर संयम, मन को बार-बार परमात्मा की ओर मोड़ना।

🌸

करुणा

हर आत्मा को प्रेम और सम्मान की दृष्टि से देखना।

💎

सत्यता

सोचने, बोलने और जीने में सत्य।

जीवन संदेश

स्वयं को पहचानो, अपनी आत्मशक्ति को जागृत करो, परमात्मा को अपने भीतर खोजो, और मानवता को एक परिवार मानकर जीवन जीयो।

शिव वेदी जागृति

ॐ शांति · ॐ शक्ति · एक विश्व, एक परिवार · जागृत सनातन